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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verses 44–45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

न विद्मः केन किं कस्य बध्यते वाथ मुच्यते । संकल्प एव रचिते बुधश्चेदविभागवान् ॥ ४४ ॥ तदसंकल्पमस्पन्दं सर्वं जातमवारितम् । स्पन्दे स्पन्दमये वाते तन्मयत्वात्सदा चिता ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

तब भला कौन- सा बन्ध, मोक्ष आदि व्यवहारो के योग्य पदार्थ है ? उसे कहते हैं। संकल्पशब्द का वाच्यभूत महाचिति का जो स्पन्दन है, वही बन्ध, मोक्ष आदि व्यपदेशो का भागी है । और तत्त्वदृष्टि से देखने पर तो वह नष्ट भी हो जाता है ॥४ २॥ श्रीरामभद्र, तत्त्वज्ञान से अहंकार के शान्त होने और आश्रयहीन होने पर तो मैं नहीं जानता कि किसका किससे क्या बद्ध होता एवं क्या मुक्त ही होता है ॥४ ३॥ तब चिति के संकल्परूप स्यन्द के त्याग का उपाय क्या है ? उसे कहते है। यदि विवेकी पुरुष स्वरचित संकल्प में ही अविभागवान्‌ है यानी "यह मुझसे संकल्पित है ओर यह नहीं" इस प्रकार के पूर्वापर-विचार से विभागों को यदि छोड देता है तो (उत्पन्न हुआ भी संकल्प बाहर स्पन्दजनन में असमर्थ होता हुआ यों ही नष्ट हो जाता है; ओर अर्थतः ही) यह सब अवारित असंकल्प ओर अस्पन्द रूप हो जाता है