Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verses 16–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
यस्य खस्येव शून्यत्वं स महात्मेह तद्वपुः ।
भावाद्वैतपदारूढः सुषुप्तपरया धिया ॥ १६ ॥
व्यवहार्यपि संक्षोभं नैत्यादर्शनरो यथा ।
आदर्शपुरुषस्येव व्यवहारवतोऽपि च ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
व्यवहारकाल में उस प्रकार की स्थिति से महात्मा का पतन नहीं होता, इसमें युक्ति बतलाते हैं।
श्रीरामभद्र, एकमात्र ब्रह्मभावना से अद्रयरूप ब्रह्मपद पर आरूढ हुआ वह महात्मा सुषुप्त पुरुष की
नाई संकल्प-विकारों से रहित निर्विकार बुद्धि से व्यवहार कर रहा भी उस प्रकार क्षोभ प्राप्त नहीं
करता, जिस प्रकार दर्पण में स्थित मनुष्य का प्रतिबिम्ब | तात्पर्य यह हे कि यतः वह एकमात्र भावना से
ही अद्रय ब्रह्मपदपर आरूढ हो चुका है, अतः व्यवहार से उस स्थिति से नहीं गिरता । (4) व्यवहार कर
रहे भी जिस पुरुष के हृदय में, दर्पणस्थ पुरुष की नाई, तनिक भी मानापमान से जनित सुखदुःख
नहीं होते, वह पुरुष मुक्ति का भागी हो जाता हे