Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verses 5–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, verses 5–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 5-11
संस्कृत श्लोक
सा परा परमा काष्ठा सा दृशां दृगनुत्तमा ।
सा महिम्नां च महिमा गुरूणां सा तथा गुरुः ॥ ५ ॥
स आत्मा तच्च विज्ञानं स शून्यं ब्रह्म तत्परम् ।
तच्छ्रेयः स शिवः शान्तः सा विद्या सा परा स्थितिः ॥ ६ ॥
योऽयमन्तश्चितेरात्मा सर्वानुभवरूपकः ।
यत्र स्वदन्ते सर्वाणि स्वात्मद्रव्याणि सत्तया ॥ ७ ॥
स जगत्तिलतैलात्मा स जगद्गृहदीपकः ।
स जगत्पादपरसः स जगत्पशुपालकः ॥ ८ ॥
स तन्तुर्भूतमुक्तानां परिप्रोतहृदम्बरः ।
स भूतमरिचौघानां परमा तीक्ष्णता तथा ॥ ९ ॥
स पदार्थे पदार्थत्वं स तत्त्वं यदनुत्तमम् ।
स सतो वस्तुनः सत्त्वमसत्त्वं वा सतः स्वतः ॥ १० ॥
यः स्ववित्तिविचित्रेण स्वयमात्मैव लभ्यते ।
सर्व एव जगद्भावा अविचारेण चारवः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
चेत्य एवं संवेद्य से विनिर्मुक्त संवित् की वह परा स्थिति "यतो वाचो निवर्तन्ते" इत्यादि श्रुतियों में
उक्त आनन्द ओर उत्कर्ष की परम्परा की परम अवधि है, वही दृष्टियों में सर्वोत्तम दृष्टि है और वही
महत्त्वों का परम महत्त्व है तथा वही मान्यो मे परम मान्य हे । तात्पर्य यह कि उससे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं
है । वही आत्मा है और वही विज्ञान है, वही शून्यस्वरूप है, वही पर ब्रह्म है, वही कल्याण है, वही
शान्तस्वरूप शिव है, वही विद्या है ओर वही परास्थिति है । चिति के भीतर समस्त अनुभवस्वरूप जो
यह आत्मा है, जिसमें सभी अपने पदार्थ सद्रूप से आस्वादित (अनुभूत) होते हैं, वही जगद्रूप तिलों का
तैलस्वरूप है ओर वही जगद्रूपी घर का दीपक (प्रकाशक) है । वह जगद्रूप वृक्ष का रस यानी सार है, वह
जगद्रूप पशु का पालक है, और प्राणीरूप मोतियों के हृदयाकाशरूप मध्य में पिरोया गया एक प्रकार का
तन्तु भी वही है । वह भूतरूप मिर्च-समूहों की तीक्ष्णता है तथा वही पदार्थों में पदार्थत्व है यानी सम्पूर्ण
पदार्थो का असाधारण स्वरूप है, जो सर्वोत्तम तत्त्व है वह भी वही हे । वही सद्रस्तुओंं मे विद्यमान सत्त्व
(सत्यत्व) है और स्वयं वही असद्रस्तु में प्रतिष्ठित असत्त्व भी है, जो आत्मतत्त्वज्ञानरूप अलौकिक
उपाय से सबको ओर स्वयं अपने को आत्मरूप में ही पाता है, अन्य रूप में नहीं । सद्रूप परमात्मा के
विकल्परूप सभी जगत्भाव, जो कि वस्तुतः अविद्यमान ही हैं, अविचार से सुन्दर प्रतीत होते हैं और
विचार से क्षीण हो जाते हैँ