Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verses 46–48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, verses 46–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 46-48
संस्कृत श्लोक
संक्षीणे न च संसारो निस्पन्दे चिद्धने स्थिते ।
चित्तेज एव चित्स्पन्द इति बुद्धे निरन्तरम् ॥ ४६ ॥
व्यतिरिक्तश्चितः स्पन्दो न किंचिदवशिष्यते ।
अस्मिन्दृश्यमये दीर्घस्वप्ने स्वप्नान्तरं व्रजन् ।
न ज्ञो मोहमुपादत्ते सर्वगत्वात्स्वसंविदः ॥ ४७ ॥
यत्रोदेति प्रसभमनिशं सर्गसंवित्तिसत्ता यस्मिन्नेते सकलकलनाकारपङ्का गलन्ति ।
उद्यन्त्येते स्वदनसुभगं यत्र सर्वोपलम्भा ध्यानेनैव तमवगमय प्रत्यगात्मानमन्तः ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार प्रबुद्ध चैतन्य के द्वारा स्पन्द और स्पन्दमय पवन के क्षीण कर दिये जानेपर तन्मूलक
संसार भी क्षीण ही हो जाता है, यह कहते है।
चूँकि यह संसार स्पन्दमय ही है, इसलिए प्रबुद्ध चैतन्य के द्वारा स्पन्द एवं स्पन्दमय पवन के नष्ट हो
जाने पर चिद्घन के स्पन्दरहित होकर सदा स्थित हो जानेपर तन्मूलक संसार भी नष्ट हो जाता हे ॥ ४ ५॥
अथवा “यह चिति का स्पन्द चित्प्रकाश से अतिरिक्त होकर दूसरा कोई पदार्थ नहीं है इस दृष्टि से
भी उसकी निवृक्ति होती है।
श्रीरामचन्द्रजी, "चित्प्रकाश ही चिति का स्पन्द है" यों निरन्तर ज्ञान करने पर यह जीव-जगद्रूप
चितिस्पन्द चिति से अतिरिक्त होकर कुछ भी अवशिष्ट नहीं रहता । श्रीरामजी, दृश्यमय इस
दीर्घस्वप्नरूप संसार में जन्मान्तर आदिरूप दूसरे स्वप्न मेँ जा रहा भी तत्त्वज्ञ अपने चलन आदि
भ्रम को प्राप्त नहीं होता, क्योकि संविद्रूप अपना तत्त्वज्ञान सर्वगामी ही है श्रीरामभद्र, जिसमें ये
सम्पूर्णं जगत् के आकारो के अनुभव, रोके जाने पर भी बलपूर्वक निरन्तर स्वजनित आनन्दास्वाद
से सुन्दरतापूर्णं उत्पन्न होते हैं, उक्त संपूर्ण ज्ञानो की स्थिति भी जिसमें उत्पन्न होती है एवं उक्त
संवित्तिरूप समस्त कल्पनाओं के आकारस्वरूप पंक जिसमें लीन हो जाते हैं, उस प्रत्यगात्मा को
आप कथित रीति से विचार द्वारा देखिए