Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verses 25–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, verses 25–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 25-28

संस्कृत श्लोक

केवलं केवलीभावात्तद्रूपा सैव शिष्यते । चित्स्पन्दमेव संसारचक्रप्रवहणं विदुः ॥ २५ ॥ मातृमानप्रमेयादि कटकादीव हेमनि । पृथगस्ति न च स्पन्दश्चितेर्या संसृतिर्भवेत् ॥ २६ ॥ चित्तमेव चितिस्पन्दस्तदबोधो हि संसृतिः । अबोधमात्रे चित्स्पन्दः कटकत्वमिवोत्थितम् ॥ २७ ॥ बोधमात्रविलीनेऽस्मिञ्छुद्धा चिद्राम शिष्यते । स्वभावबोधमात्रेण क्षीयते भोगवासना ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

तव जीवन्मुक्त में वह संसार कैसे अवशिष्ट रहता है ? इस पर कहते है। विवर्तशून्य केवल आत्मरूप बन जाने के कारण जीवन्मुक्तो को वह संसार चिद्रूप होकर ही अवशिष्ट रहता हे । अतः मुनिलोग आत्मा के विवर्त को ही प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेय आदिस्वरूप संसार-चक्र की परम्परा कहते हे । जैसे सुवर्णं मेँ कटक आदि सुवर्णं से पृथक्‌ नहीं हे, वैसे ही चिति का स्पन्द भी चिति से पृथक्‌ नहीं है-जो संसार हे । चित्त ही चितिका विवर्त है, इसलिए फलित यही हुआ कि चितिस्वरूप का अज्ञान ही संसार है । श्रीरामजी, अज्ञान-दशा में ही यह चितिस्पन्द, सुवर्ण मे उत्थित कटकरूपता की नाई, उत्पन्न हुआ है, अतः एकमात्र बोध से इस चितिस्पन्द के विलीन हो जानेपर शुद्धरूपा चिति ही अवशिष्ट रह जाती हे । स्वात्मस्वरूप के बोधमात्र से ही भोगवासना क्षीण हो जाती हे । भोगवासना का विनाश हो जानेपर अपने-आप सिद्ध हुआ विषयों का अचिन्तन ही यहाँ उत्तम जीवन्मुक्त का स्वरूप समझा गया हे