Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verses 41–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, verses 41–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
समास्त्वित्यपि बन्धस्ते श्रेयोऽसंवेदनं परम् ।
यदनाभासमजडं तद्विद्धि परमं पदम् ॥ ४१ ॥
चितः स्वरूपं संस्थानमचेत्योन्मुखतात्मकम् ।
यः संकल्पनशब्दार्थरूपः स्पन्दो महाचितः ॥ ४२ ॥
बन्धमोक्षादिकार्होऽसौ प्रेक्ष्यमाणः प्रणश्यति ।
प्रेक्षणादेव संशान्ते त्वहंभावे निरास्पदे ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वयंप्रकाश,
चैतन्यरूप, सब पदार्थो का आश्रय ओर विषयोन्मुखता से रहित चिति का जो स्वरूप है, उसे ही
आप परमपद जानिए