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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 49

अइताली सर्वं सर्ग समाप्त उनचायवाँ सर्ग विकारों से विवर्त में विलक्षणता, प्रबोध के अभाव से अविद्या की स्थिति और प्रबोध हो जाने पर अविद्या का अभाव-इनका वर्णन ।

35 verse-groups

  1. Verse 1विकार और कार्य से स्वरूपतः विवर्त में भेद की जिज्ञासा कर रहे श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं ।…
  2. Verse 2कारण में कार्य की उत्पत्ति पाँच प्रकार की होती है, १-पहली में पूर्वावस्था तिरोहित नहीं हो…
  3. Verse 3दही बन जाने से दूध पुनः अपनी पयोरूपता में (दूधरूप पूर्वावस्थामें) नहीं आता । परह्य में तो…
  4. Verse 4इससे दूध आदि के समान ब्रह्म में विकारिता नहीं है। (जैसे परमाणुओं से द्रवणुक आदि अवयवियों…
  5. Verse 5तो परिशेषात्‌ यह सिद्ध हुआ कि जगत्‌ ब्रह्म का विवर्त ही है, यही उसके लक्षण से दिखलाते हैं…
  6. Verse 6ब्रह्म मे वैषम्य- संस्पर्श का अभाव दिखलाते है। उस ब्रह्म मे न तो संवेद्य (विषय) विद्यमान…
  7. Verse 7मध्य में ब्रह्म का विकार से स्पर्श नहीं होता, यह कैसे मालूम पडता है ? ऐसी यदि कोई शंका कर…
  8. Verse 8स्वप्रकाशस्वभाव होने से आत्मा में तो समता सवनुभव सिद्ध है, अतः उसमें अनात्मरूपता की तनिक…
  9. Verse 9नीरूप, एक तथा नित्यस्वरूप होने के कारण यह परब्रह्म परमात्मा भावविकारों के वश में कभी भी न…
  10. Verse 10चित्प्रकाशेकरस ब्रह्म में उससे विरुद्ध स्वभाववाली अविद्या की भला कैसे प्रसक्ति हो सकती है…
  11. Verse 11हम ब्रह्म में अविद्या का सद्भाव ज्ञानियों की दृष्टि से नहीं कहते, कितु अज्ञानियो को ज्ञान…
  12. Verse 12“ब्रह्म” इस शब्द से वाच्य एवं वाचक का जो एक प्रकार से उपक्रम करते हैं, वहाँ पर भी हम अन्य…
  13. Verse 13हे श्रीरामचन्द्रजी, आप और मैं, यह संसार और दिशाएँ, आकाश और पृथ्वी अथवा अग्नि आदि (जो कुछ…
  14. Verse 14श्रीरामचन्द्रजी, जो विद्यमान ही नहीं है, भला वह किस तरह सत्य हो सकती है ?
  15. Verse 15जव अविद्या का अस्तित्व ही नहीं है तभी तो आपने उपशम-प्रकरण में यथा भ्रान्तिरविद्येयं तथेत्…
  16. Verse 16वह तो आपकी अज्ञानता-दशा में आपकी बुद्धि के अनुसार कल्पना से मैंने कहा था अव तो आप भलरीभाँ…
  17. Verse 17श्रीरामचन्द्रजी, वेदरूप वाणी का रहस्य जाननेवालों में सर्वश्रेष्ठ विद्वानों ने "यह अविद्या…
  18. Verse 18जव तक मन प्रबुद्ध नहीं हो जाता तब तक अविद्या आदि शास्त्रीय व्यवहारो की कल्पना के बिना सैक…
  19. Verse 19केवल एकमात्र युक्ति से ही बोध कराकर इस जीव को आत्मा में नियुक्त कर सकते हैं, क्योकि जो का…
  20. Verse 20दोषों के विद्यमान रहते तत्त्वोपदेश देना व्यर्थ है, इस आशय से कहते हैं। अज्ञानी दुर्मति के…
  21. Verse 21मूर्ख युक्ति से प्रबोधित होता हे ओर प्राज्ञ तत्त्व से युक्ति से बोध कराये बिना मूर्ख प्रा…
  22. Verse 22श्रीरामचन्द्रजी, इतने काल तक अप्रबुद्ध रहे आपको मैंने युक्तियों से प्रबोधदशा में पहुँचा द…
  23. Verse 23वही कहते हैं। मैं ब्रह्म हूँ, तीनों जगत्‌ ब्रह्म है, आप ब्रह्म हैं और यह दृश्य पृथिवी ब्र…
  24. Verse 24समस्त भ्रान्तियों के बाध की चरमसीमाभूत, लौकिक ज्ञान की अविषय महाचिति के स्वरूपभूत ही ये त…
  25. Verse 25हे श्रीराघव, स्थित हो रहे, जा रहे, श्वास ले रहे तथा शयन कर रहे आप अपने हृदय में "सर्वव्या…
  26. Verse 26हे श्रीराघव, यदि उत्तम रीति से आप अभिमान से शून्य, ममता से रहित और बुद्धिमान हैं तो सम्पू…
  27. Verse 27सर्वव्यापी, एकरूप, शुद्ध संवित्स्वरूप हुए आप वह श्रुतिप्रसिद्ध, आदि और अन्त से रहित, प्रक…
  28. Verse 28ब्रह्म, तुरीय, आत्मा, अविद्या, प्रकृति तथा जगत्‌ आदिरूप से जो प्रसिद्ध पदार्थ हैं; वे सबक…
  29. Verse 29जैसे घट से मृण्मयता पृथक्‌ नहीं हे वैसे ही आत्मा से प्रकृति पृथक्‌ नहीं हे । ओर जैसे घट क…
  30. Verses 30–31जल के आवर्तं की नाई जो यह आत्मा का विवर्तन है, वही प्रकृति शब्द से कहा गया है और सन्मात्र…
  31. Verse 32जैसे वायु ओर उसका स्पन्दन एक ही पदार्थ हैं और नाम से दोनों भिन्न होते हुए भी सत्ता से वे…
  32. Verse 33चिद्रूपी खेत में जो यह कल्पनारूपी बीज गिरता हे, वही चित्तरूपी अंकुर होकर उससे स्फुरित होत…
  33. Verse 34आत्मज्ञान से दग्ध हुआ यही कल्पनारूपी बीज (चिद्रूपी खेत में) वासना रूपी जल से यत्नपूर्वक भ…
  34. Verse 35यदि चिद्रूप खेत में कल्पनारूपी बीज न बोया जाय तो उससे उन चित्तरूपी अंकुरों की उत्पत्ति भी…
  35. Verse 36प्रस्तुत उपदेश-रहस्य का उपसंहार करते है। श्रीरामचन्द्रजी, चूँकि आप ज्ञान प्राप्त कर चुके…