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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

समस्याद्यन्तयोर्येयं दृश्यते विकृतिः क्षणात् । संविदः संभ्रमं विद्धि नाविकारेऽस्ति विक्रिया ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

तो परिशेषात्‌ यह सिद्ध हुआ कि जगत्‌ ब्रह्म का विवर्त ही है, यही उसके लक्षण से दिखलाते हैं। (7)) इससे वैशेषिक-मत में स्वीकृत आरम्भकत्व का लक्षण भी सूचित किया गया है। वे उसका इस प्रकार लक्षण कहते हैं- अनेक संयुक्तों या समवेतों का अपने में या अपने आश्रय में समवेत (समवायसम्बन्ध से विद्यमान) पदार्थो में समवायसम्बन्ध से किसी एक कार्य के प्रति जनक होना ही आरम्भकत्व है । जैसे पटात्मक कार्य का तंतु आरम्भक है वहाँ संयुक्तद्रव्यभूत तन्तु अपने मेँ समवाय सम्बन्ध से पटात्मक कार्य का जनक है | तंतु का रूप पटगत रूप का आरम्भक है | तंतुरूपाश्रय तंतु में समवेत पट में समवायसम्बन्ध से पटगतरूप के प्रति तंतु का रूप जनक है। इसी आशय को लेकर महर्षि कणाद ने यह सूत्र रचा है- "द्रव्याणि द्रव्यान्तरमारभन्ते गुणाश्च गुणान्तरम्‌“ (अवयवभूत द्रव्य अवयविभूत द्रव्यों के आरम्भक हैं और अवयवगत गुण अवयविगत गुणान्तरं के आरम्भक हैं)। श्रीरामचन्द्रजी, समस्वरूप ब्रह्म का आदि और अंत में जो क्षणभर के लिए विकार (अन्यथाभाव) दिखलाई पडता है, उसे आप संवित्‌ का संभ्रम (विवर्त) ही जानिए, क्योकि अविकारी ब्रह्म में कोई विकार नहीं हो सकता (निष्कर्ष यह निकला कि आदि ओर अंत सभी दशाओं में एकरूप से रहनेवाले ब्रह्म में उसका स्पर्श न करनेवाली विषमता का प्रतिभास ही विवर्त हे)