Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
यदि नास्ति विकारादि ब्रह्मन्ब्रह्मणि बृंहिते ।
तदिदं कथमाभाति भावाभावमयं जगत् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
विकार और कार्य से स्वरूपतः विवर्त में भेद की जिज्ञासा कर रहे श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, नित्य निरतिशय वृद्धि से युक्त यानी त्रिविध परिच्छेदों से शून्य
ब्रह्म में यदि विकार और आरम्भ नहीं हैं तो भाव और अभाव स्वरूप इस संसार का भान कैसे
होता है ?
सर्ग सन्दर्भ
अइताली सर्वं सर्ग समाप्त उनचायवाँ सर्ग विकारों से विवर्त में विलक्षणता, प्रबोध के अभाव से अविद्या की स्थिति और प्रबोध हो जाने पर अविद्या का अभाव-इनका वर्णन ।