Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
आत्मा त्वाद्यन्तमध्येषु समः सर्वत्र सर्वदा ।
स्वमप्यन्यत्वमायाति नात्मतत्त्वं कदाचन ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्रकाशस्वभाव होने से आत्मा में तो समता सवनुभव सिद्ध है, अतः उसमें अनात्मरूपता की
तनिक भी संभावना नहीं है, यह कहते हैं।
आत्मा तो आदि, अन्त और मध्य में सर्वत्र सदा एकरूप है। स्वस्वरूप आत्मतत्त्व कभी भी विषमभाव
को प्राप्त नहीं होता