Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
उपशमप्रकरणे ह्यस्तने तु त्वयेरितम् ।
अविद्येयं तथेत्थं च विचार्यत इति प्रभो ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जव अविद्या का अस्तित्व ही नहीं है तभी तो आपने उपशम-प्रकरण में यथा भ्रान्तिरविद्येयं
तथेत्थं च विचायते“ - यों अविद्या का अस्तित्व स्वीकार कर कहा है । इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी
आशंका करते है ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे प्रभो, कल के उपशम-प्रकरण में तो आपने कहा था कि मनुष्य को जैसी
भ्रान्ति होती है,वैसी ही यह अविद्या है, इसका इस तरह मैं वर्णन करता हूँ