Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अपुनःप्रागवस्थानं यत्स्वरूपविपर्ययः ।
त्तद्विकारादिकं तात यत्क्षीरादिषु वर्तते ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
कारण में कार्य की उत्पत्ति पाँच प्रकार की होती है, १-पहली में पूर्वावस्था तिरोहित नहीं होती,
२-दूसरी में पूर्वावस्था प्रतिबद्ध हो जाती है, ३-तीसरी में पूर्वावस्था छिप जाती है, ४- चौथी में
पूर्वावस्था छिप नहीं जाती और ५-रपँववी में पूर्वावस्था विनष्ट हो जाती है। इनमें प्रथम-मिडी आदि
में घड़े आदि की उत्पत्ति, द्वितीय-जल में हिमोत्पत्ति, तृतीय-रज्जु में सर्पोत्पत्ति, चतुर्थ-जल में
तरंगोत्पत्ति और पंचम - दूध में वही की उत्पत्ति समझनी चाहिए । इनमें केवल अन्तिम ही
जन्मादिभावविकार और परिणाम स्वरूप है, अवशिष्ट चार तो विवर्त के ही भेद हैं; इस आशय से
महाराज वसिष्ठजी पहले-पहल विकार का लक्षण बतलाते हैं।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : तात, दूध आदि में दही आदिरूप जो कार्य पुनः दूध आदिरूप अपनी
पूर्वावस्था से रहित तथा दूध आदि के स्वरूप से विपरीत रहते हैं, वे ही विकार, संस्कार ओर परिणाम
आदि शब्दों से कहे जाते हैं