Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 3
दूसरा सर्ग समाप्त तीसरा सर्ग ब्रह्म, जीव, मन, देह एवं जगत में एकता के दर्शन से समस्त द्रैतभ्रम की शान्ति हो जाने पर परिपूर्ण एकरूप से स्थिति होती है, यह वर्णन ।
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- Verse 1सबसे पहले वित्स्वरूप आत्मा समस्त कल्यनाओ के प्रतिभास में हेतु है, यों आत्मा का परिचय करात…
- Verse 2उक्त भावना के अनन्तर एकमात्र द्वैतभावना के परित्याग से ही प्रपंच तथा वासना से शून्य आत्मच…
- Verse 3आत्मस्वरूप का परिचय हो जाने पर जीव, वासना और जगत यह जो विभाग है, वह चित् का ही एक काल्पन…
- Verse 4रामनामक ऊर्मियों से प्रसन्न, एकरूप, आकाश की नाई सोम्य, बड़ी- बड़ी सृष्टिरूपी जल लताओं से…
- Verses 5–6अव दुश्यपदार्थद्रष्टा से पृथक् नहीं है, इसकी दरष्टा के धर्मरूपता के उपपादनमुख से सिद्धि…
- Verses 7–8अध्यास-क्रम के उद्घाटन द्वारा प्रतिपादित अर्थ स्पष्टरूप से वतलाते है । चिति से (मूलाधिष्ठ…
- Verse 9श्रीरामजी, प्रस्तुत यह दृश्यमान जगत-रूपी चक्र चिति ने ही स्वरूपभ्रम से अध्यासपरम्परा से प…
- Verse 10भद्र, यथार्थ में तो यह सब कुछ अनन्त विभागवर्जित स्वचैतन्यरूप आकाश ही अपने में विद्यमान है…
- Verse 11उसकी निरतिशय परिपूर्णरूपता का ही भगिभेदों से निरूपण करते है । शून्य में शून्य बढ़ा है, ब्…
- Verse 12अनुपादेय बुद्धि से बाह्य इन्द्रियों और मन के व्यापारों को कर रहा भी ज्ञानी कुछ भी नहीं कर…
- Verse 13श्रीरामजी, जिन विषयों का उपादेयबुद्धि से ग्रहण करेंगे, वे ही आपके दुःख एवं सुख के लिए हों…
- Verse 14नानारूप से प्रतीयमान भावों का अभाव कैसे हो सकता है ? इस पर कहते हैं। जिस प्रकार घट, पट, म…
- Verse 15भद्र, आप भीतर से आकाश की नाई निर्मल, बाहर से अपने वर्णाश्रमानुकूल सुन्दर आचरणों में निरत…
- Verse 16शत्रु के शरीर में भी अपनी आत्मरूपता होने से अपने शरीर के सदश वहाँ पर भी आत्मज्ञानी को स्व…
- Verse 17उसी से हर्ष-अमर्ष दोष की निवृत्ति होती है, ऐसा कहते हैं। जिस प्रकार तटवर्ती वृक्ष को नदी…
- Verse 18भद्र, राग-द्वरेष और उनके कार्यभूत विकारों के स्वरूप का (तत्त्व का) यदि विचार नहीं किया जा…
- Verse 19तब राग-द्वेष का स्वरूप क्या है ? अहंकार । अतः अहंकार का विनाश करने पर राग-द्वेष की आत्यन्…
- Verse 20“माया शब्द का प्रयोग किया गया हे । वह माया एकमात्र आत्मज्ञान से ही निश्चित विनष्ट हो जाती…
- Verse 21जिसका तेल आदि स्नेह से शून्य दीपक की नाई अनन्त वासनासमूह विनष्ट हो चुका है, उसने सब रागाद…
- Verse 22जिस महापुरुष को ये समस्त भोग्यपदार्थ सत्-असत् अवस्थाओं में (आविभव-तिरोभाव की अवस्थाओं म…