Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
य एवातितरां शत्रुः सत्वरं मारणोद्यतः ।
तमेवाकृत्रिमं मित्रं यः पश्यति स पश्यति ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
शत्रु के शरीर में भी अपनी आत्मरूपता होने से अपने शरीर के सदश वहाँ पर भी आत्मज्ञानी को
स्वाभाविक प्रीति होती है, यह बतलाते हैं।
जो तत्क्षण मारने के लिए उद्यत अत्यन्त ही कठोर शत्रु है, उसे स्वाभाविक प्रियतम मित्र के रूप में
जो देखता है, वही यथार्थ में देखनेवाला है यानी आत्मज्ञानी है