Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
भव भावनया मुक्तो भावाभावविवर्जितः ।
चिदात्मन्संस्थिताः केव वद ते वासनादयः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त भावना के अनन्तर एकमात्र द्वैतभावना के परित्याग से ही प्रपंच तथा वासना से शून्य
आत्मचैतन्य का स्वरूप अनुभवपथ में कराते हैं।
हे श्रीरामजी, यह भाव है और यह अभाव है, इस प्रकार की कल्पना से शून्य होकर द्वैतभावना से
निर्मुक्त हो जाइए | हे चित्स्वरूप, बतलाइए कि आपमें वासना आदि कहाँ निवास करते हैं ? अर्थात्
कहीं निवास नहीं करते, यह तात्पर्य हे