Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यस्यानुपादेयमिदं समस्तं पदार्थजातं सदसद्दशासु ।
न दुःखदाहाय सुखाय नैव विमुक्त एवेह सजीव एव ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस महापुरुष को ये समस्त भोग्यपदार्थ सत्-असत् अवस्थाओं में (आविभव-तिरोभाव की
अवस्थाओं में, वैभव-दारिद्रय-अवस्थाओं में या अध्यारोप-अपवाद दशाओं में) मिथ्या अथवा
तत्वतः आत्मरूप होने के कारण सदा प्राप्त होने से अनुपादेय होकर उनकी प्राप्ति ओर अप्राप्ति
प्रयुक्त दुःख-दाह एवं सुख के हेतु नहीं होते, वह जी रहा भी असलियत में मुक्त ही है