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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

जीवोऽयं वासनादीदमिति चित्कचति स्वतः । इतरोक्त्यर्थयोरत्र कः प्रसङ्गोऽङ्ग कथ्यताम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मस्वरूप का परिचय हो जाने पर जीव, वासना और जगत यह जो विभाग है, वह चित्‌ का ही एक काल्पनिक भेद है, उसका पृथक्‌ अस्तित्व अनुभव में आ नहीं सकता, यों कहते हैं। हे प्रिय श्रीरामचन्द्रजी, यह जीव है, यह वासना है, इस प्रकार की जो प्रसिद्धि होती है, वह स्वतः चित्‌ की ही होती है, अत: असत्‌ शब्द और असत्‌ अर्थ इन दोनों की आपत्ति ही चिद्रूप वस्तु में कैसे हो सकती है ? यह बतलाइए