Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
यथा नानाप्यनानैव खं खे खानीति वाग्गणः ।
सार्थकोऽप्यतिशून्यात्मा तथात्मजगतोः क्रमः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
नानारूप से प्रतीयमान भावों का अभाव कैसे हो सकता है ? इस पर कहते हैं।
जिस प्रकार घट, पट, मठ आदि उपाधियों से अनेकरूप होता हुआ भी आकाश वास्तव में एकरूप
ही है, नानारूप नहीं है एवं आकाश में अनेक आकाश हैं, इस प्रकार के शब्द प्रयोग अत्यन्त शून्यार्थक
होते हुए भी घट आदि उपाधियों के कारण सार्थक होते हैं, उसी प्रकार आत्मा और जगत के क्रम के
विषय में समझना चाहिए