Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
शून्यं शून्ये समुच्छूनं ब्रह्म ब्रह्मणि बृंहितम् ।
सत्यं विजृम्भते सत्ये पूर्णे पूर्णमिव स्थितम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
उसकी निरतिशय परिपूर्णरूपता का ही भगिभेदों से निरूपण करते है ।
शून्य में शून्य बढ़ा है, ब्रह्म मे ब्रह्म बढा हुआ है, सत्य में सत्य का ही प्रकाशन हो रहा है और पूर्ण में
पूर्ण की नाईं अवस्थित है