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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । भाविभूरितरङ्गाणां पयोवृन्दमिवाम्बुधौ । या चिद्वहत्यनन्तानि जगन्त्यनघ सो भवान् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

सबसे पहले वित्स्वरूप आत्मा समस्त कल्यनाओ के प्रतिभास में हेतु है, यों आत्मा का परिचय कराते हैं । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, जिस प्रकार समुद्र में होनेवाले असंख्य तरंगों का हेतु सामान्य जल का स्वरूप है, उसी प्रकार जो चैतन्यात्मक चिति है, वही असंख्य भुवन वहन करती है, वह आप हैं, यानी वही आत्मा है, यों भावना कीजिए

सर्ग सन्दर्भ

दूसरा सर्ग समाप्त तीसरा सर्ग ब्रह्म, जीव, मन, देह एवं जगत में एकता के दर्शन से समस्त द्रैतभ्रम की शान्ति हो जाने पर परिपूर्ण एकरूप से स्थिति होती है, यह वर्णन ।