Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verses 7–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, verses 7–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 7,8
संस्कृत श्लोक
चितो न भिन्नोऽनुभवो भिन्नो नानुभवादहम् ।
न मत्तो भिद्यते जीवो न जीवाद्भिद्यते मनः ॥ ७ ॥
मनसो नेन्द्रियं भिन्नं पृथग्देहश्च नेन्द्रियात् ।
न शरीराज्जगद्भिन्नं जगतो नान्यदस्ति हि ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
अध्यास-क्रम के उद्घाटन द्वारा प्रतिपादित अर्थ स्पष्टरूप से वतलाते है ।
चिति से (मूलाधिष्ठान ब्रह्म से) अनुभव भिन्न नहीं हे, अनुभव से माया-वृत्ति में आरूढ़ चिदात्मा
"अहम्" से (व्यष्टि-समष्टिरूप अहंकार से) भिन्न नहीं है, “अहम्” से जीव भिन्न नहीं है, जीव से मन
भिन्न नहीं हे, मन से इन्द्रिय भिन्न नहीं हे, इन्दियों से देह भिन्न नहीं हे, शरीर से (व्यष्टि-समष्टि देह
से) जगत भिन्न नहीं है, जगत से भिन्न अन्य पदार्थ नहीं है