Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
तब राग-द्वेष का स्वरूप क्या है ? अहंकार । अतः अहंकार का विनाश करने पर राग-द्वेष की
आत्यन्तिक निवृत्ति हो जायेगी, इस आशय से गीता-वाक्य का दृष्टान्तरूप से उद्धरण देते हैं।
जिस महात्मा को देह आदि अनात्म पदार्थों में अहंभावना नहीं होती और जिसकी बुद्धि राग-द्वेष
आदि से युक्त नहीं रहती, वह महात्मा इन लोकों का विनाश भले ही कर ले, तथापि वह न विनाशकर्ता
है और न विनाशजन्य दोष से आक्रान्त ही होता है