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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

रागद्वेषविकाराणां स्वरूपं चेन्न भाव्यते । ततः सन्तोऽप्यसद्रूपाः सेविता अप्यसेविताः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, राग-द्वरेष और उनके कार्यभूत विकारों के स्वरूप का (तत्त्व का) यदि विचार नहीं किया जाता, तो राग-द्वेषशून्यरूप से प्रसिद्ध महात्मा भी राग-द्वेष युक्त ही है ऐसा समझना चाहिए, क्योकि राग-द्वेष का तत्त्व जाने बिना उनके मूल का उच्छेद न हो सकने के कारण उनको फिर राग-द्वेष की प्रसक्ति हो सकती है, उसका निवारण नहीं किया जा सकता, अतः ऐसे महात्माओं की सेवा करना भी असेवा ही है यानी वृथा है