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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 24

तेईसवाँ सर्ग समाप्त चौबीसवाँ सर्ग देहनाड़ी के क्रम से युक्त षट्चक्र हृदय से अन्वित तथा प्राण के स्पन्दनं के विभागों से आढ्य प्राणचिन्तन का वर्णन |

35 verse-groups

  1. Verse 1यदि जगत में कुछ भी सुन्दर और स्थिर नहीं है, तो वैसा कौन शोभन और स्थिर है, जिसमें विवेकी प…
  2. Verse 2ब्रह्मन्‌, साक्षात्कार पर्यन्त किया गया आत्मा का विचार समस्त दुःखों का अन्त कर देनेवाला त…
  3. Verse 3आत्मविचार एकमात्र निर्मल मनरूप मार्ग से प्राप्त होनेवाले निरतिशय भूमानन्दरूपी प्रांगण में…
  4. Verse 4भगवन्‌, चन्द्रिका के सदृश तथोक्त आत्मचिन्ता से अज्ञानरूपी अन्धकार का, उसके कार्यो के साथ…
  5. Verse 5महात्मन्‌, आपके जैसे उत्तम पुरुषों में वह आत्मदृष्टि सुलभ है ओर हम लोगों के सदृश पामरों म…
  6. Verse 6तव वह आत्म-दुष्ि तुम्हें कैसे सुलभ हुई, इस प्रश्नपर उसकी सखी के आश्रय से प्राप्त हुई, इस…
  7. Verses 7–8हे मुनिराज, आत्मचिन्ता से मिलती-जुलती विविध आत्मचिन्ता की सखियों के बीच में से एक प्राणचि…
  8. Verse 9महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, उस तरह कह रहे मननशील भुशुण्ड पक्षी से जानते हुए भी मै…
  9. Verse 10समस्त सन्देहो को काटनेवाले हे अत्यन्त दीर्घजीवी साधो, तुम मुझसे ठीक-ठीक कहो कि प्राण- चिन…
  10. Verse 11भुशुण्ड ने कहा : हे मुने, आप समस्त वेदान्तो को जानते हैं, समस्त संशयो का विनाश भी करते है…
  11. Verse 12अथवा हे भगवन्‌, आपके सदृश पूज्यतम लोगों की सन्निधि में इसी प्राणदर्शन की विशेष रूप से शिक…
  12. Verse 13महाराज, भुशुण्ड को जिसने चिरंजीवी बनाया है तथा जिसने भुशुण्ड को स्वकीय आत्मा की प्राप्ति…
  13. Verse 14भगवन्‌, इस समस्त देहरूपी मनोहर घर को देखिए, इसमें वात, पित्त और कफ, ये त्रिविध दोष बड़े-ब…
  14. Verse 15यह, पुर्यष्टकरूपी कलत्र से पुर्यष्टक-मात्रारूपी स्वजन यानी बन्धुवर्गो से एवं अहंकाररूपी ग…
  15. Verse 16महाराज, जिसका में वर्णन करने जा रहा हूँ, उस देहरूपी घर का आप अपने भीतर साक्षीरूप से प्रत्…
  16. Verse 17उस देहरूपी घर का मुख ही सुन्दर प्रधान -द्वार है, दोनों हाथ एवं पार्श्वभाग उसके उप-मन्दिर…
  17. Verse 18समस्त बाह्य विषयों का भीतर ज्ञान करानेवाली ज्ञानन्द्रियाँ ही उसमें निरन्तर द्वारपाल का का…
  18. Verse 19रक्त मांस और वसारूपी मानों जल, मृतिका एवं गोबर से वह उपलिप्त है, शिरारूपी रज्जु-समूह से व…
  19. Verse 20मुनिराज, इडा ओर पिंगला नाम की दो अत्यन्त सूक्ष्म नाड़ियाँ इस देहरूपी घर के बीच दाहिने ओर…
  20. Verse 21उसमे समस्त प्राण-शक्तियो के आधारभूत (पुरीतत्‌ नामक तीन हृदयकमलयन्त्रो का, जो नालयुक्त संप…
  21. Verse 22महाराज, नासिका के अग्रभाग से लेकर पैरतक समस्त शरीराकाश में संचरण कर रहे चन्द्रनामक अपान-व…
  22. Verse 23उससे प्रकृत मे क्या आया ? इस पर कहते है । मुनिवर, जब उक्त वायुओं से हृदय-कमल के पत्ते संक…
  23. Verse 24तदनन्तर उस प्रकार वृद्धि को प्राप्त हुआ वह वायु हृदय, गुदा, नाभि, कण्ठ एवं समस्त अंगों को…
  24. Verse 25उसे ही कहते हैं। तदनन्तर चित्र-विचित्र संचरण ओर चेष्टाओं के कारण उसी हृदय वायु को पण्डित…
  25. Verse 26उन प्राणो के साथ प्राण-शक्तियो का भी सब अंगों मे संवरण होता है, यह बतलाते हैं। हे मुने, द…
  26. Verse 27अन्न-रस का सारे शरीर में सम्बन्ध कराने के लिए नाडियों में हुए उन प्राणशक्तियों के व्यापार…
  27. Verse 28उनका मुख्य स्थान हृदय ही है ओर उनमें मुख्य प्राण ही है, अपान आदि प्राण ही विशेष वृत्तियाँ…
  28. Verse 29उसीकी कोई एक शक्ति स्पर्श का ग्रहण करती हे, दूसरी कोई शक्ति नासिका द्वारा श्वास -उच्छवास…
  29. Verse 30महाराज, इस विषय में अधिक कहने से क्या फल ? शरीर में जो कुछ यह क्रिया या व्यापार होता है,…
  30. Verse 31हे मुने, उसमें ऊर्ध्वगमन ओर अधोगमन यों दो प्रकार के संकेतवाले जो दो वायु प्रसृत हैं, वे द…
  31. Verse 32उस प्रकार उपोद्घातसम्बन्धी सब वस्तुओं का वर्णन कर अब वायसराज भश्ुण्डजी स्वयं जिसका अनुष्ठ…
  32. Verse 33मुनिराज, प्राण ओर अपान दोनों शरीररूपी महायन्त्र के दो घोड़े हे, श्रम से (मृत्यु से) रहित…
  33. Verse 34महाराज, शरीररूपी नगर के रक्षक मन के रथ के वे दोनों पहिये हैं और अहंकाररूपी इस राजा के सुन…
  34. Verses 35–36महर्षे, उन प्राण ओर अपान नामक शरीर-वायुओं की-जो जीवनपर्यन्त अविच्छिन्न उपासित तथा जाग्रत…
  35. Verses 37–38प्राणायाम के अभ्यास से उनमें अतिसूक्ष्मरूपता की प्राप्ति हो जाने के कारण भी उत्क्रमण आदि…