Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
तयोरनुसरन्नित्यं मुने गतिमहं स्थितः ।
शीतोष्णवपुषोर्नित्यं नित्यमम्बरपान्थयोः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
उस प्रकार उपोद्घातसम्बन्धी सब वस्तुओं का वर्णन कर अब वायसराज भश्ुण्डजी स्वयं जिसका
अनुष्ठान करते हैं, उस प्राणचिन्ता का दिग्दर्शन कराते है ।
हे मुने, मे उनकी गति का सदा अनुसरण करता हुआ स्थित रहता हूँ (८) । उनका स्वरूप सदा
शीतल ओर उष्ण रहता है एवं वे दोनों निरन्तर आकाश मार्ग के पथिक हैं