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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

अनारतं रूपरसस्पर्शनद्वारपालवत् । संकुलालोकवलितं तारालिन्दकृतस्थिति ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

समस्त बाह्य विषयों का भीतर ज्ञान करानेवाली ज्ञानन्द्रियाँ ही उसमें निरन्तर द्वारपाल का कार्य करती है । लिंगदेह के सम्बन्ध द्वारा सर्वत्र प्रसृत आत्मप्रकाश से वह व्याप्त है और वही आत्म-प्रकाश (विशेषरूप से जाग्रत-अवस्था में) उसके (देहगृह के) कनीनिकारूपी (आँखों की पुतलियाँरूपी) दो ऊर्ध्वतम द्वार के समीप की कोठरियों में गृहपति के रूप में स्थिति करता है (~)