Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
सेकेन विकसत्पत्रं सकलाकाशचारिणा ।
चलन्ति तस्य पत्राणि मृदु व्याप्तानि वायुना ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज, नासिका के अग्रभाग से लेकर पैरतक समस्त शरीराकाश
में संचरण कर रहे चन्द्रनामक अपान-वायुरूप अमृत के सिंचन से उसके पत्ते विकसित होते हैं (और
प्राण-वायु के संचार से कुछ संकुचित भी होते हैं), इसलिए प्राण ओर अपान-वायु से व्याप्त हुए उस
हृदय-कमलयन्तर के पत्ते प्रत्येक उच्छवास-निःश्वास में संकुचित एवं विकसित हुआ करते हैं