Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
यान्त्यायान्ति विकर्षन्ति हरन्ति विहरन्ति च ।
उत्पतन्ति पतन्त्याशु ता एताः प्राणशक्तयः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्न-रस का सारे शरीर में सम्बन्ध कराने के लिए नाडियों में हुए उन प्राणशक्तियों के व्यापार को
बतलाते हैं।
(>) इस विषय में “इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेक्षन्पुरुषः', “नेत्रस्थं जाग्रतं विद्यात्“ ये श्रुतियाँ
प्रमाण हैं |
वे प्राणशक्तिर्यो ही शीघ्र गति, आगति, विकर्षण, हरण, विहरण, उत्पतन एवं निपतन करती हैं यानी
शरीर ओर तदीय तत्-तत् अंशों में सर्वत्र अन्न-रस आदि की गति आदि का निर्वाह करती हैं