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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

स एष हृत्पद्मगतः प्राण इत्युच्यते बुधैः । अस्य काचिन्मुने शक्तिः प्रस्पन्दयति लोचने ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

उनका मुख्य स्थान हृदय ही है ओर उनमें मुख्य प्राण ही है, अपान आदि प्राण ही विशेष वृत्तियाँ हैं, अतः प्राण ही विभिन्न शक्तियों से वृत्तियों द्वारा समस्त शरीर, इन्द्रिय आदि का व्यापार करता है, ऐसा कहते हैँ । हे मुने, हृदय-कमल में स्थित यही वायु पण्डितो द्वारा प्राण कहा जाता है, इसकी कोई एक शक्ति नेत्रो को स्पन्दित करती है यानी नेत्रो मे निमेष-उन्मेष करती हे