Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 2
पहला सर्ग समाप्त दूसरा सर्गं श्रीरामचन्द्र आदि के द्वारा महाराज वसिष्ठजी का सभा में आनयन तथा महर्षि द्वारा उक्त अर्थ के स्मरण से उनकी आत्मतत्व में विश्रान्ति-यह वर्णन ।
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- Verse 1श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : तदनन्तर चन्द्ररूपी मुख से तथा व्याकुल अन्धकाररूपी पैरों से युक्त…
- Verse 2अनन्तर पूर्वाभिमुख मनुष्यों द्वारा दिखाई पडनेवाले पूर्वदिशास्थ पर्वतो के ऊपर शिखरो से प्र…
- Verse 3तदनन्तर बरफ के कणों का आकर्षण करनेवाला, चन्द्रमण्डल को आकृष्ट करनेवाला तथा सूर्यरूपी अपने…
- Verse 4श्रीरामजी, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न अपने-अपने अनुचरो के साथ उठकर स्नान, सन्ध्या आदि कर्मो का…
- Verse 5वहाँ जाकर सन्ध्याकर आश्रम से बाहर निकलनेवाले महर्षि वसिष्ठजी के चरणों में उन्होने अर्घ्यस…
- Verse 6क्षणभर में महर्षि वसिष्ठजी का आश्रम मुनियो, ब्राह्मणों ओर राजाओं से तथा हाथी, अश्व, रथ आद…
- Verse 7तदनन्तर मुनियों मे सिंहरूप महाराज वसिष्ठजी उस सेना के साथ ही राम आदि से अनुगत होकर यथासमय…
- Verse 8वहाँ पर त्वरापूर्वक मिलने के उत्साह से सन्ध्या किये हुए महाराज दशरथ ने आदरपूर्वक दूर मार्…
- Verse 9पुष्पों, मोतियों तथा मणियों के समूहों से पहले की अपेक्षा पुनः अधिक सजाई गई सभा में प्रविष…
- Verse 10अनन्तर उसी समय पहले दिन के जो आकाशचर, भूचर आदि श्रोता थे, वे सब-के-सब आ धमके
- Verse 11एक दूसरों का परस्पर अभिवादन करके सभा बैठ गई, उस समय राजाओं के अनुरूप आकार प्रकारवाली सौम्…
- Verses 12–17जब सभामण्डप में ब्राह्मण आदि -श्रोतागण प्रविष्ट हो गये, वे प्रत्येक दिन के लिए निश्चित अप…
- Verse 18तदनन्तर वाक्य रचना में पटु महामुनि वसिष्ठजी, पहले से चले आ रहे क्रम से ही, वाक्यार्थ के व…
- Verse 19महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, मेने जो कल सुन्दर पद्धति से अत्यन्त गहन अर्थवाला…
- Verse 20शत्रुनाशक श्रीरामभद्र, अब मेरे द्वारा कहे जा रहे इस अन्य ज्ञानहेतु अर्थ का श्रवण कीजिए, ज…
- Verse 21श्रीरामजी, वैराग्य के अभ्यास से तथा आत्मतत्व के विज्ञान से संसार तरा जाता है, अतः आप उन्ह…
- Verse 22सम्यक् तत्त्व के अवबोध से अज्ञान का क्षय हो जाने तथा वासना-संस्थान का विनाश हो जाने पर श…
- Verse 23देशतः, कालतः ओर वस्तुतः त्रिविध परिच्छेद से शून्य तथा देश ओर काल निबन्धन पूर्वं ओर अपर दो…
- Verse 24जिस अवस्था में समस्त भावों से अनवच्छिन्न, शान्त तथा गोत्वादि धर्मो में भी अनुगत होकर एकरू…
- Verse 25उस प्रकार के ब्रह्मस्वरूप का निश्चय कर ओर “अहम्” अभिमान का परित्याग कर आप मुक्त शरीर, मह…
- Verse 26चित्त नहीं है, अज्ञान नहीं है, मन नहीं है और जीव भी नहीं है, हे श्रीरामजी, ये ब्रह्म की अ…
- Verse 27भद्र, जो भोग्यरूप पदार्थ है, जो भोगार्थ व्यापार हैं, जो उनमें प्रतिबिम्बित चिदाभास या स्म…
- Verse 28पाताल आदि देश, स्वर्ग, तृण आदि वस्तु, भूत, वर्तमान आदि काल, प्राणी एवं आकाश सर्वत्र वह नि…
- Verse 29उपेक्ष्य, हेय, उपादेय, बन्धु, सम्पत्तिर्यो, देह इन सभी रूपों से आदि ओर अन्त से शून्य परब्…
- Verse 30क्या सदा ही ब्रह्म विकसित होता है 2 नहीं, ऐसा कहते हैं। जब तक अज्ञान की कल्पना रहती है, ज…
- Verses 31–33जब तक देह में अहंभावना रहती है, जब तक इस दृश्य में आत्मरूपता रहती है, जब तक यह मेरा है, इ…
- Verses 34–35जब तक पूर्णता का उदय नहीं होता है और जब तक सज्जनों के संसर्ग से मूर्खता का विनाश नहीं होत…
- Verse 36जब तक हृदयरूपी अरण्य में आशारूपी विषगन्ध चारों ओर फैलती रहती है, तब तक उत्तम आत्मविचाररूप…
- Verse 37तृष्णारूपी मोह के परित्याग से अविनाशी सुशीतल आत्मज्ञान सम्पन्न तथा प्रशान्तचित्त पुरुष की…
- Verses 38–39चिन्तका अनुदय ही चित्त त्याग है, इस आशय से कहते है। उपयोग से रहित दूरवर्ती अवस्तु रूप अतए…
- Verses 40–41जिसका श्रवण, मनन, निदिध्यासन तथा तन्मूलक आत्मसाक्षात्कार से परिष्कृत चिन्मात्रस्वरूप संसा…
- Verse 42चित्त का अभाव हो जाने पर व्यवहार कैसे होगा 2 इस पर कहते है। सत्य एवं असत्य वस्तु का साक्ष…
- Verse 43जीवन्मुक्तो के शरीरो मेँ जो व्यवहार करनेवाली वासना हे, वह चित्त नाम की नहीं हे, क्योकि वह…
- Verse 44चित्तवर्जित, सर्वदा परब्रह्मपद में अवस्थित, जो तत्त्वज्ञानी महात्मा हैं, वे सत्त्व में स्…
- Verse 45तव क्या तत्त्वज्ञो को वासना से व्यवहार और परमार्थ दोनों का अपरोक्ष ज्ञान होने के कारण द्व…
- Verse 46उसीका स्पष्टीकरण करते है । भ सर्वात्मिक हूँ 'इस प्रकार की परिपूर्ण आत्मभावना से समस्त त्र…
- Verse 47अतएव अज्ञानी के चित्त की अपेक्षा सत्व विलक्षण (भिन्न) है, इस आशय से कहते हैं। विवेक से वि…
- Verse 48जब तक विमूढ मनुष्यों के भीतर वासना चित्तशब्द से व्यवह्वत होती है, तब तक वह पुनर्जन्म की ह…
- Verse 49श्रीरामजी, आप प्राप्तव्य वस्तु को प्राप्त कर चुके हैं, आपका अन्तःकरण सत्त्वरूपता को प्राप…
- Verse 50तब कैसा अन्तःकरण पुनः अंकुरित होता है ? तो इस पर कहते हैं। जिस प्रकार परशु से छिन्न अथवा…
- Verse 51ज्ञानरूपी अग्नि से कैसे बीजशक्ति का दाह होता है ? इस पर कहते है। चूँकि, जगत अज्ञानवश आरोप…
- Verse 52जिस प्रकार एकमात्र तीक्ष्णतारस से युक्त मिर्च के अन्दर तीक्ष्णता मिर्चरूप से विद्यमान है,…
- Verse 53तब क्या (असद्वा इदमग्र आसीत्” (सृष्टि के पहले यह जगत असदात्मक ही था) इत्यादि श्रुति प्रस…
- Verse 54आत्मत्वभ्रममूलक जन्म ओर मरण आदि अनर्थ-प्राप्ति से रोने का प्रसंग नहीं है, ऐसा कहते हैं। (…
- Verse 55श्रीरामजी, यदि चित्-व्यावृत्तिरूप केवल जाड्य अंश का परित्याग कर समस्त जगत सदा चिन्मय ही…
- Verse 56श्रीरामजी, अपने विशाल स्वरूप का आप स्मरण कीजिए, चित्स्वरूप का विस्मरण करके आप परिच्छिन्न…
- Verse 57भद्र, उस परिपूर्ण चित्स्वभावस्थिति को प्राप्त होकर आप सर्वातिशायी उत्तम आनन्द के लाभ आदि…
- Verse 58श्रीरामजी, आप चित्-शिला के उदरस्वरूप ही है, अनेक भावों के रूप में आप अवस्थित होनेवाले नह…
- Verse 59आप सत्स्वरूप है ओर असत्स्वरूप है, इस अंश का विवरण करते है । जो सम्पूर्ण पदार्थो का व्यावृ…
- Verse 60हे श्रीरामजी, आदि और अन्त से शून्य विशाल स्फटिक शिला के अन्तराल की नाई निबिड जो चिद्घन है…