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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 57

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

तां स्वसत्तां गतः सर्वमसर्वं भावयोदयी । तादृग्रूपोऽसि शान्तोऽसि चिदसि ब्रह्मरूप्यसि ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, उस परिपूर्ण चित्स्वभावस्थिति को प्राप्त होकर आप सर्वातिशायी उत्तम आनन्द के लाभ आदि से महान अभ्युदयवाले होकर परिच्छिन्न जगत अपरिच्छिन्न पूर्ण स्वभाव है, ऐसी भावना कीजिए । आप वही परिपूर्णरूप हैं, शान्त (उपद्रव शून्य) हैं, चैतन्यरूप हैं ओर ब्रह्मरूप हे