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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 58

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

चिच्छिलोदरमेवासि नासि नानास्यथाप्यसि । योसि सोसि न सोसीव सदस्यसदसि स्वभाः ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी, आप चित्‌-शिला के उदरस्वरूप ही है, अनेक भावों के रूप में आप अवस्थित होनेवाले नहीं हे, अनेक भावों के बाध की अवधिरूप से अवशिष्ट रहनेवाले भी आप हैं, समस्त वाणी और मन की प्रवृत्ति के हेतु का जहाँ अभाव हो जाता है, वह भी आप ही हें । (तब क्या अत्यन्त परोक्ष-स्वरूप हैं ? नहीं, यह कहते है ।) तत्स्वरूप आप परोक्ष-से नहीं है क्योकि आप सदा स्वप्रकाशस्वरूप हैं