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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

भोगेष्वनास्थमनसः शीतलामलनिर्वृतेः । छिन्नाशापाशजालस्य क्षीयते चित्तविभ्रमः ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

जब तक हृदयरूपी अरण्य में आशारूपी विषगन्ध चारों ओर फैलती रहती है, तब तक उत्तम आत्मविचाररूप चकोर भीतर घुसने नहीं पाता ॥ ३ ५॥ जिसका अन्तःकरण भोगों में आस्था नहीं रखता, जिसका सुशीतल निर्मल पद प्राप्त हुआ है एवं जिसकी आशारूपी फाँसी का जाल छिन्न-भिन्न हुआ है, उसको चित्त विभ्रम नष्ट हो जाता है