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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

शान्ता व्यवहरन्तोऽपि सत्त्वस्थाः संयतेन्द्रियाः । नित्यं पश्यन्ति तज्जयोतिर्न द्वैतैक्येन वासना ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

तव क्या तत्त्वज्ञो को वासना से व्यवहार और परमार्थ दोनों का अपरोक्ष ज्ञान होने के कारण द्वैत ओर अद्वैत दोनो रहते हैं 2 नहीं, ऐसा उत्तर देते हैं। सत्त्ववृत्ति में अवस्थित तथा निगृहितेन्द्रिय शान्त महात्मा लोग अद्रय ब्रह्मरूप ज्योति का सदा साक्षात्कार करते हुए रहते हैं, अतः उन्हें द्रेतता, एकता या वासना नहीं हो सकती, क्योकि ब्रह्यप्रकाश के साक्षात्‌ अवलोकन से उनका बाध हो चुका हे