Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
सर्वभावानवच्छिन्नं यत्र ब्रह्मैव विद्यते ।
शान्तं समसमाभासं तत्रान्यत्वं कथं भवेत् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस अवस्था में समस्त भावों से अनवच्छिन्न, शान्त तथा गोत्वादि धर्मो में भी
अनुगत होकर एकरूपतः भासनेवाले ब्रह्म की ही अस्तिता सर्वोपरि विराजित है, उस अवस्था मे द्वैतपन
कैसे रह सकता है ?