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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verses 40–41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, verses 40–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 40,41

संस्कृत श्लोक

असम्यग्दर्शने शान्ते मिथ्याभ्रमकरात्मनि । उदिते परमादित्ये परमार्थैकदर्शने ॥ ४० ॥ अपुनर्दर्शनायैव दग्धसंशुष्कपर्णवत् । चित्तं विगलितं विद्धि वह्नौ घृतलवं यथा ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसका श्रवण, मनन, निदिध्यासन तथा तन्मूलक आत्मसाक्षात्कार से परिष्कृत चिन्मात्रस्वरूप संसार प्रसिद्ध स्वरूप से भिन्नरूपवाला यानी आत्मस्वरूप बन गया है एवं जिसको अपने चित्त में ही जगत विलीन हो गया है, उस पुरुष के जीव आदि निखिल भ्रम शान्त हो जाते हैं ॥३ ९॥ भद्र, मिथ्या भ्रम को उत्पन्न करनेवाले आत्म-अन्धकार का विनाश तथा परमार्थभूत आत्मज्ञानरूप उत्तम सूर्य का उदय होने पर चित्त विगलित होकर उस प्रकार पुनः दर्शन नहीं देता, जिस प्रकार अग्नि में सूखा पत्ता या घी का अंश गिरने पर पुनः दर्शन नहीं देता