Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verses 38–39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, verses 38–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
असंस्तुतमिवानास्थमवस्तु परिपश्यतः ।
दूरस्थमिव देहं स्वमसन्तं चित्तभूः कुतः ॥ ३८ ॥
भावितानन्तचित्तत्त्वरूपरूपान्तरात्मनः ।
स्वान्तावलीनजगतः शान्तो जीवादिविभ्रमः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
चिन्तका अनुदय ही चित्त त्याग है, इस आशय से कहते है।
उपयोग से रहित दूरवर्ती अवस्तु रूप अतएव भ्रमात्मक पुरुषाकृति की नाई अपनी देह को आस्था
छोडकर देख रहे पुरुष के चित्त की उत्पत्ति होगी कैसे २