Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verses 12–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, verses 12–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 12-17
संस्कृत श्लोक
यथाप्रदेशमेवाशु निविष्टेषु यथासुखम् ।
तेषु तद्देशयोगेषु विप्रर्षिमुनिराजसु ॥ १२ ॥
मृदुनि स्वागतरवे शनैः शममुपागते ।
सभाकोणोपविष्टेषु शान्तशब्देषु बन्दिषु ॥ १३ ॥
तरसैवोदितेष्वाशु श्रोतुमभ्यागतेष्विव ।
गवाक्षादिव जालेषु प्रविष्टेष्वर्करश्मिषु ॥ १४ ॥
सत्वरप्रविशच्छ्रोतृहस्तस्पर्शघटोद्भवे ।
मुक्ताजालझणत्कारे निद्रायामिव शाम्यति ॥ १५ ॥
कुमारः शंकरस्येव कचो देवगुरोरिव ।
प्रह्लाद इव शुक्रस्य सुपर्ण इव शार्ङ्गिणः ॥ १६ ॥
वसिष्ठस्यानने रामः शनैर्दृष्टिं न्यवेशयत् ।
भ्रमन्तीमम्बरोपान्ते फुल्लपद्म इवालिनीम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जब सभामण्डप में ब्राह्मण आदि -श्रोतागण प्रविष्ट हो गये, वे प्रत्येक दिन के
लिए निश्चित अपने-अपने आसन के अनुसार बैठ गये, उनके परस्पर के कोमल स्वागत शब्द शान्त हो
गये, सभा के कोनो मे स्थित बंदीजनों के शब्द भी शान्त हो गये, उदित सूर्यरश्मियाँ मानों अतित्वरा से
सुनने के लिए अभ्यागतो मे खिड़कियों के द्वारा प्राप्त होकर प्रविष्ट हो गई ओर जल्दी-जल्दी सभा में
प्रवेश कर रहे श्रोताओं के अंगों के आघात से उत्पन्न मोतियों के समूह से युक्त भूषणो का झनकार
निद्रा की नाई स्पन्दशून्य हो गया, तब शंकर के आनन (मुख) में कुमार की नाई, देवगुरु के आनन में
कच की नाई, शुक्राचार्य के आनन में प्रह्माद की नाई ओर भगवान विष्णु के आनन में गरुड की नाई
श्रीरामचन्द्रजी ने महाराज वसिष्ठ के आनन में, विकसित कमल में आकाशप्रान्त में विहरण करनेवाली
भ्रमरी की तरह, दृष्टि धीरे से लगाई