Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 77
पचहत्तरवाँ सर्ग समाप्त छिहत्तरवाँ सर्ग संसाररूपी जलधि, स्त्रीरूपी तरंग, उसके तरण का उपाय और तरने के अनन्तर सुखपूर्वक विचरण का वर्णन |
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- Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे राघव, ये समस्त जगत् अविज्ञात ब्रह्म से ही आविर्भूत होते हैं,…
- Verse 2ब्रह्मरूपीसमुद्र मे जगत्-समूहरूपी जल के तरगों की गिनती कौन कर सकता है ? क्या कोई सूर्य क…
- Verse 3हे रामजी, आत्मा का यथार्थ ज्ञान न होना ही जगत् की स्थिति में कारण है और आत्मा का यथार्थ…
- Verse 4हे श्रीरामजी, यह संसार-सागर ऐसा घोर है कि इसके पार हो जाना अत्यन्त दुष्कर है, युक्ति ओर प…
- Verses 5–12उसी संसार-सागर का वर्णन करते हैं। जिसके मोहरूपी जल से भरा गया, पूर्ण यह संसाररूपी सागर जो…
- Verse 13प्रज्ञारूपी बड़ी नौका ओर विवेकरूपी नाविक के रहने पर यदि इस संसार रूपी सागर से जो पार नहीं…
- Verse 14हे श्रीरामजी, अपारावार यानी असीम संसार समुद्र का आत्मतत्त्व के दर्शन से बाध कर उसको चारों…
- Verse 15हे श्रीरामजी, आर्य यानी बड़े-बड़े तत्त्वज्ञो के साथ ब्रह्म का विचारकर तथा वैसी बुद्धि से…
- Verse 16हे साधो, इस संसार में आप धन्य हैं, क्योकि विचारप्रवीण बुद्धि से आप इसी बाल अवस्था में धन्…
- Verse 17हे श्रीरामजी, आपकी नाई संसार का विचारप्रवीण आदि उत्तम बुद्धि से पहले विचारकर जो अधिकारी प…
- Verse 18हे श्रीरामजी, जैसे गरुडजी के द्वारा अमृत लाने के पहले सर्पो की उपेक्षा की गई थी, फिर माता…
- Verse 19लोक मेँ भी राजकीय विभूति के उपभोग में यह न्याय प्रसिद्ध है, ऐसा कहते है। विचारपूर्वक राजप…
- Verse 20तत्त्वज्ञान के बाद ही भोगजरणोपपादक विशेषण सम्पत्ति प्राप्त होती है उसके पूर्व नहीं ऐसा कह…
- Verses 21–44श्रीरामचन्द्रजी को भोगजरण की सामर्थ्य नहीं है, इस आशंका का परिहार करने के लिए तत्त्ववोध-…