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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 77, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 77, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 77 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

यथावस्तु यथादृष्टं जगदेकमयात्मकम् । तदा बन्धविमोक्षाणां न क्वचित्कृपणं मनः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञान के बाद ही भोगजरणोपपादक विशेषण सम्पत्ति प्राप्त होती है उसके पूर्व नहीं ऐसा कहते हैं । जिसने तत्त्व को जान लिया है, ऐसे पुरुष के बल, बुद्धि और तेज उस प्रकार बढ़ते हैं, जिस प्रकार वसन्त ऋतु से युक्त वृक्ष के सौन्दर्य आदि गुण बढ़ते हैं