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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 77, Verses 5–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 77, verses 5–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 77 · श्लोक 5-12

संस्कृत श्लोक

नादत्तमप्युपादत्ते गृहीतमपि पाणिना । अन्तर्मुखतयोदात्तरूपया समया धिया ॥ ५ ॥ यन्त्रपुत्रकसंचार इतीमं जनताक्रमम् । अन्तःसंलीनया दृष्ट्या पश्यन्हसति शान्तधीः ॥ ६ ॥ नापेक्षते भविष्यं च वर्तमाने न तिष्ठति । न संस्मरत्यतीतं च सर्वमेव करोति च ॥ ७ ॥ सुप्तः प्रबुद्धो भवति प्रबुद्धोऽपि च सुप्तवान् । सर्वं कर्म करोत्यन्तर्न करोति च किंचन ॥ ८ ॥ अन्तःसर्वपरित्यागी नित्यमन्तरनेषणः । कुर्वन्नपि बहिः कार्यं सममेवावतिष्ठते ॥ ९ ॥ बहिः प्रकृतसर्वेहो यथाप्राप्तक्रियोन्मुखः । स्वकर्मक्रमसंप्राप्तबन्धुकार्यानुवृत्तिमान् ॥ १० ॥ समग्रसुखभोगात्मा सर्वाशास्विव संस्थितः । करोत्यखिलकर्माणि त्यक्तकर्तृत्वविभ्रमः ॥ ११ ॥ उदासीनवदासीनः प्रकृतः क्रमकर्मसु । नाभिवाञ्छति न द्वेष्टि न शोचति न हृष्यति ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

उसी संसार-सागर का वर्णन करते हैं। जिसके मोहरूपी जल से भरा गया, पूर्ण यह संसाररूपी सागर जो कि मरणरूपी अगाध आवर्तं से और बड़े बड़े तरगों से व्याप्त कोटरो से युक्त है ओर जिसमें चक्कर काट रहे पुण्यरूपी फेन हैं, धधकता हुआ नरकरूपी बडवानल है, और तुष्णारूप चंचल लहरियाँ हैं तथा जल में उत्पन्न हुआ मनरूपी जल-हाथी हैं, जिसमें जीवितरूपी नदियाँ लीन हो जाती हैं, एवं जो विषयोपभोगरूपी रत्नों की पिटारी है, क्षुब्ध रोगरूपी सर्पो से आक्रान्त है, जिसमें इन्द्रियरूपी मगरों की घर-घर ध्वनि होती है। श्रीरामजी देखिये तो सही, इसमें अत्यन्त चपल, बड़े-बड़े शिखरों की नाईं धीर महानुभावों का आकर्षण करने की क्षमता रखनेवाली मुग्ध अंगनारूपी विस्तृत बीचियाँ है, ये बीचियाँ दन्तच्छेदों की शोभा से पद्मराग मणियों से समन्वित, नेत्ररूपी नीलकमल से व्याप्त, दाँतरूपी मुकुलों से युक्त, स्मितरूपी फेन से सुशोभित, केशरूपी इन्दुनील मणि से वेष्टित, भौरों के विलासरूपी तरंगों से तरंगित, नितम्बरूपी पुलिन से स्फीत, कण्ठरूपी शंखों से विभूषित, ललाटरूपी मणिपट्टों से (रत्नफलकों से) आढ्य, विलासरूपी मगरों से युक्त, कटाक्षं की चपलता के कारण अतिगहन, देहकान्तिरूपी सुवर्ण बालुका से युक्त हैं, इस प्रकार की अतिचंचल लहरियों के कारण जो अत्यन्त भयंकर है उस में निमग्न हुआ पुरुष यदि बाहर हो जाय, तो यह परम पुरुषार्थ ही होगा