Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 77, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 77, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 77 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
न तस्य सुकृतेनार्थो न भोगैर्न च कर्मभिः ।
न दुष्कृतैर्न भोगानां संत्यागेन न बन्धुभिः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी,
जैसे गरुडजी के द्वारा अमृत लाने के पहले सर्पो की उपेक्षा की गई थी, फिर माता के शापविमोचन
के अनन्तर उनका निःशेष उपभोग किया जाता है, वैसे ही सबसे पहले इस प्रकार के समान भय
देनेवाले भोगों के स्वरूप का बुद्धि से विचारकर उनकी उपेक्षा करनी चाहिए, ओर फिर उनका
उपभोग करना चाहिए