Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 77, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 77, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 77 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
कैवल्यमिव संप्राप्तः परिसुप्तमना इव ।
घूर्णमान इवानन्दी तिष्ठत्यधिगतात्मदृक् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, यह संसार-सागर ऐसा
घोर है कि इसके पार हो जाना अत्यन्त दुष्कर है, युक्ति ओर प्रयत्न के सिवा इसका तरण नहीं किया
जा सकता