Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 62
इकसठवाँ सर्ग समाप्त बासठवाँ सर्ग अज्ञानरूपी आवरण के हट जाने पर नित्यचित्-स्फुरण की अवस्था से विद्वानों की सदा सर्वदा अद्वितीय ब्रह्म में ही समाधि होती है, यह वर्णन ।
22 verse-groups
- Verse 1महर्षि श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, तदनन्तर चिरकाल तक करीब करीब उस तरह की प्राचीन प्र…
- Verse 2क्या यह राजा सुरघु मेरे पूछने पर व्यवहार ओर समाधि दोनों दशाओं मे तत्त्व में तत्ववित् पुर…
- Verse 3इस तरह अपने अनुभव का प्रकाशन कर वह युक्त है या अयुक्त इस विषय में दूसरे के अनुभव की जिज्ञ…
- Verse 4जबकि आपका यह अनुभव है। समाहित चित्तवाले पुरुष के सभी कर्म सुख के लिए हैं और आपके इस अनुभव…
- Verse 5महात्मन्, जो तत्त्वज्ञ पुरुष है, वह चाहे चुप-चाप ही सदा व्यवहार करे चाहे अव्यवहार करे, त…
- Verse 6यदि आत्मस्वरूप में अटल अवस्थित रहना ही समाधि है, यह आपका मत है, तो वह सदा है ही, फिर कुछ…
- Verses 7–8यदि आप मुझे अज्ञानी मानते हैं, तो भी समाधि का उपदेश अयुक्त है ऐसा कहते हैं । जिसका अन्तःक…
- Verse 9भगवन्, चुपचाप बैठे रहना समाधि नहीं कहलाता, किन्तु समस्त आशारूप तृणों के लिए अग्निरूप जो…
- Verse 10उसीका फलतः वर्णन करते है। क्षोभ से रहित, अहंकार से शून्य, सुखदुःख आदि द्रन्दरो मे न गिरने…
- Verse 11चिन्ता से वर्जित, अभीष्ट पदार्थ को प्राप्त हेय ओर उपादेय से रहित तथा परिपूर्ण जो मानसिक व…
- Verse 12वैसी समाधि तो मुझको पहले से ही सिद्ध है, उसके अनुष्ठान की आवश्यकता नही है, इस आशय से कहते…
- Verse 13जैसे क्रीडा कर रहे बालक के हाथ से दूर खींचा गया कमल का तन्तु टूट जाता है, वैसे प्रबुद्ध अ…
- Verse 14यदि शंका हो कि तत्त्ववेत्ता को भी ब्रह्माकाखृत्ति का विच्छेद होने पर व्युत्थानावस्था में…
- Verse 15आत्सस्वरूप को आवृत करनेवाले अज्ञान का एक बार उदित हुई ब्रह्माकार वृत्ति से समूल नाश हो जा…
- Verses 16–17अथवा परम प्रे का भाजन होने से एक बार भी प्राप्त हुए तत्त्वज्ञान का विस्मरण नहीं होता, इस…
- Verse 18जिसका आवरण विनष्ट हो चुका है, ऐसा आत्मा स्वाकारवृत्तियो को लगातार उत्पन्न करता ही स्थित र…
- Verse 19अथवा तत्त्वज्ञ के जीवनकाल का आत्मावबोध असाधारण धर्म है, अत: उससे तत्त्वज्ञ का कमी भी वियो…
- Verse 20अथवा जैसे अग्नि का उष्णत्व स्वभाव है, वैसे ही तत्त्वज्ञ का आत्मबोध स्वभाव है, इसलिए तत्त्…
- Verses 21–22मैं सदा-सर्वदा ही आत्मज्ञान से सम्पन्न हूँ, सदा-सर्वदा ही निर्मल- स्वभाव हूँ, सदा-सर्वदा…
- Verse 23यदि आप यह मानते हैं कि मन है, तो वह सदा सर्वदा समाहित ही है और यदि यह मानते हैं कि मन नही…
- Verse 24चूँकि यह जो कुछ दिखलाई पड़ता है, वह सभी कुछ सदा सब प्रकार सर्वव्यापक आत्मस्वरूप ही है, इस…
- Verse 25उत्तम महात्मन्, जिनकी बुद्धि से भेद का विघटन हो गया है यानी जिनकी बुद्धि में तनिक भी भेद…