Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
नित्यं समाहितधियः सुसमा महान्तस्तिष्ठन्ति कार्यपरिणामविभागमुक्ताः ।
तेनासमाहितसमाहितभेदभङ्ग्या नित्योदितः क्व नु स उत्तमवाक्प्रपञ्चः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
उत्तम महात्मन्, जिनकी बुद्धि से भेद का विघटन हो गया है यानी
जिनकी बुद्धि में तनिक भी भेद के लिए स्थान नहीं है अतएव जो कार्यो के परिणामों में यानी सुख-दुःख
आदि विकारों से होनेवाली भेद-भावनाओं से विनिर्मुक्त हो चुके हैं ऐसे बड़े-बड़े तत्त्ववित् सदा सर्वदा
एक ही स्वरूप से समदृष्टि होकर स्थित रहते हैं, इसलिए समाहित और असमाहित के भेद को मानकर
प्रवृत्त हुआ आपका वह वाणी का प्रपंच किस अर्थ का बोधक होगा ? किसी अर्थ का नहीं अर्थात् आपकी
वाणी का विलास मिथ्या ही है, यह भाव है