Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
न संभवति संसारे गुणहीनो गुणी यथा ।
न संभवत्यात्मसंविद्वर्जितो ह्यात्मवांस्तथा ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा जैसे अग्नि का उष्णत्व स्वभाव है, वैसे ही तत्त्वज्ञ का आत्मबोध स्वभाव है, इसलिए तत्त्वज्ञ
का आत्मबोध से विच्छेद नहीं होता, इस आशय से कहते है ।
जैसे संसार में उष्णत्व आदि स्वाभाविक गुणों से युक्त अग्नि आदि गुणवान् पदार्थ कभी भी उक्त
गुणों से विहीन नहीं रहते, वैसे ही आत्मा की पहचानकर चुकनेवाला आत्मवान् ज्ञानी कभी भी आत्मज्ञान
से विहीन नहीं होता