Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, Verses 21–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 21,22
संस्कृत श्लोक
सर्वदैवास्मि संबुद्धः सर्वदैवास्मि निर्मलः ।
सर्वदैवास्मि शान्तात्मा सर्वदास्मि समाहितः ॥ २१ ॥
भेदः केन समाधेर्मे जन्यते कथमेव वा ।
आत्मनोऽव्यतिरेकेण नित्यमेव सदात्मता ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
मैं सदा-सर्वदा ही आत्मज्ञान से सम्पन्न हूँ, सदा-सर्वदा ही निर्मल-
स्वभाव हूँ, सदा-सर्वदा ही शान्तात्मा हूँ और सदा-सर्वदा ही समाधियुक्त हूँ । मेरा समाधि से विच्छेद
किससे और कैसे हो सकता है ? क्योकि मेरी समाधि आत्मस्वरूप से भिन्न नहीं है, अत: उसका
अस्तित्व सदा सर्वदा बना हुआ ही है