Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
यो ज्ञो महात्मन्सततं तिष्ठन्त्यवहरंश्च वा ।
असमाहितचित्तोऽसौ कदा भवति कः किल ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
महात्मन्, जो तत्त्वज्ञ पुरुष है, वह चाहे
चुप-चाप ही सदा व्यवहार करे चाहे अव्यवहार करे, तो भी उसका समाहित चित्तता को छोड़ कर
और क्या स्वरूप हो सकता है ? क्योकि अनावृत-स्वभाव होने के कारण कभी भी असमाहित
चित्तवाला नहीं हो सकता