Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
परिघ उवाच ।
यद्यत्संसारजालेऽस्मिन्क्रियते कर्म भूमिप ।
तत्समाहितचित्तस्य सुखायान्यस्य नानघ ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
क्या यह राजा सुरघु मेरे पूछने पर व्यवहार ओर समाधि दोनों दशाओं मे तत्त्व में तत्ववित् पुरुष के
सुख का उत्कर्ष ओर अपकर्षरूप तारतम्य कहेगा या नहीं, इसकी परीक्षा करने के लिए पहले अपने
अनुभव का उद्घाटन करते है ।
परिघ ने कहा : राजन्, इस संसाररूपी जाल में रह कर जो जो कर्म किये जाते हैं, वे समाहित
चित्तवाले ज्ञानी के लिए तो सुखकारक हैं, पर उससे भिन्न अज्ञानी के लिए सुखकारक नहीं हे