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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, Verses 16–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

न विस्मरत्यविरतं यथा कालः कलागतिम् । न विस्मरत्यविरतं स्वात्मानं प्राज्ञधीस्तथा ॥ १६ ॥ न विस्मरति सर्वत्र यथा सततगो गतिम् । न विस्मरति निश्चेयं चिन्मात्रं प्राज्ञ धीस्तथा ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा परम प्रे का भाजन होने से एक बार भी प्राप्त हुए तत्त्वज्ञान का विस्मरण नहीं होता, इस आशय से कहते हैं। जैसे काल अपनी कलाओं की गति का कभी भी विस्मरण नहीं करता, वैसे ही तत्ववित्‌ पुरुष की बुद्धि अपने आत्मस्वरूप का कभी भी विस्मरण नहीं करती जैसे सर्वत्र सदा-गतिस्वभाव वायु अपनी गतिका विस्मरण नहीं करता, वैसे ही तत्ववित्‌ ज्ञानी की प्रज्ञा निश्चय करने योग्य चितिमात्र का कभी विस्मरण नहीं करती